Text selection Lock by Hindi Blog Tips

Monday, October 19, 2009

www.blogvani.com चिट्ठाजगत
एक और दोगला !

मेरी आँखों के आँसुओं को
केवल नमकीन पानी समझना
और, अपने आँसुओं को
खून के आँसुओं की संज्ञा देना
तुम्हारे दोगले स्वभाव का
परिचायक ही तो है
वगरना
मेरे जिस आघात से
तुम्हे चोट पहुँची
मुझे भी तो वैसे ही
तुम्हारे आघात से
अधिक नहीं तो
कुछ तो दर्द हुआ ही होगा
यदि तुम यह समझ पाते
तो
न तुम्हे दर्द होता
न मुझे होता
न तुम रोते !
न मैं रोता !!
- डा0अनिल चड्डा

Thursday, October 15, 2009

www.blogvani.com चिट्ठाजगत
"मेरा जीना जीना है"

मीरा ने तो
किया था
एक बार विषपान
मुझे
बार-बार करना है
गुज़री थी
एक बार
अग्निपरीक्षा से सीता
मुझे बार-बार जलना है
जितना विष
पिलाओगे तुम मुझे
होगा नुकीला
उतना ही
मेरा दंश
पिलाओगे आग
जितनी मुझे
उगलेगी कलम
उतनी ही बन दबंग
चाहो तो
कर डालो टुकड़े
मेरे ह्र्दय के तारों के
या लटका दो सरेआम मुझे
किसी चौराहे पर
फिर भी मैं लिख ही दूँगा
कटे-फटे
कागज़ के टुकड़ों पर
या
गंदी बस्ती की दीवारों पर
तुम मुझे
जलाते हो
ज़हर देते हो
खोल न दूँ कहीं मैं
भेद तुम्हारा
बता न दूँ विशव को
कि
जीने के लिए
हर क्षण मरते हो
मारते हो
और
मर-मर कर जीते हो
मरता तो
मैं भी बार-बार हूँ
मरना तो निश्चित है
दोनों का
पर मैं मरता हूँ
किसी के लिए
फिर भी मुझे जीना है
पर तुम्हारा जीना है
क्षण-भंगुर
और
मेरा जीना
जीना है

Saturday, October 10, 2009

www.blogvani.com चिट्ठाजगत
"विष-अमृत"

जब से
आस्तीनों से
साँप निकलने लगे
तब से
मैंने आस्तीनों वाले
वस्त्र ही पहनने छोड़ दिये
पर
अपनी भुजाओं का
क्या करूँ ?
जो साँप बन
मुझे ही
डसने को तत्पर हैं !
मेरे दोस्त,संगी, साथी, पत्नी, बेटा-बेटी
सब ही तो
मेरी भुजाएँ थी
कैसे काटता इन्हे ?
काट भी पाता क्या??
अवश हो
चारों ओर से
ग्रहण किया हुआ विष
पन्नों पर उँडेलता हूँ जब
तो वह भी
सर्पों से लपलपाते
मुझे ही
डसने को उचकते हैं
मेरी व्यथा
मैं ही तो समझ पाऊँगा
शेष सब की संवेदना तो
उनके अंदर के विष से
छिन्न-भिन्न हो
मर चुकी है
पर यह विष
मेरे लिये तो
अमृत सिद्ध हो रहा है -
मेरी संवेदना
और पैनी हो
इस विष को
समय-समय पर
पन्नों पर
उतारती चली जा रही है !

Wednesday, September 23, 2009

www.blogvani.com चिट्ठाजगत
"रोना"
हँसता रहा
तो सब आये
रोना पड़ा
अकेला था
मैं भी अकेला
तू भी अकेला
जग सारा ही अकेला था
मैं भी रोया
तू भी रोया
जग सारा ही रोया था
किसके लिए पर
कौन कह यहाँ रोया था
मैं समझा था
मेरे लिये तो
कोई यहाँ पर रोया है
अज्ञान था वो सब
सारा जन्म
मैंने जो बोझा ढ़ोया था
कौन बनेगा ढ़ोने वाला
सोच के वह यूँ रोया था !

Wednesday, September 2, 2009

www.blogvani.com चिट्ठाजगत
"हार-जीत"

हारता रहा मैं
हर कदम पर
एक और विश्वास
संजोते रहे तुम
जीत-जीत कर
अविश्वासों की ट्राफियाँ !
हार कर भी
मेरे पास है
वेदना-लिप्त तृप्ति
पर तुमने
क्या पा ली
इस जीत अभियान से
शाँति !!
- डा0 अनिल चड्डा

Tuesday, August 18, 2009

www.blogvani.com चिट्ठाजगत
"रिश्ते"

(1)

कल रात
एक और रिश्ते की
मौत हो गई
पड़ोस में
अतिवेदना के स्वर
कुत्ते-बिल्ली का रोना था
सुबह-सवेरे उठ कर
कोई नया रिश्ता जोड़ना था
तकियों में सिर छुपाये
लंबी तान सो रहे
भई
किसे फुर्सत है मरने की
मिट्टी परआँख भरने की !

(2)

एक बार फिर
कोई रिश्ता मर गया
उम्र भर
जिसने चूमा-चाटा
साथ सुलाया
उससे ही
भरी भीड़ में
डर गया !

-डा0 अनिल चड्डा

Thursday, August 13, 2009

www.blogvani.com चिट्ठाजगत
"बदलते आदर्श"

(3)

और द्रोण
तुम्ही ने तो
आदर्शों का
अंगूठा था काटा
तभी तो
शत-शत आदर्श
बाण बन
बिछौना बने थे
भीष्म का !

- डा0अनिल चड्डा